Thursday, August 27, 2009

जूती

औरत-

पैर की जूती ही सही

मगर

क्या यह भी ध्यान है (?)

कि

जूती के काट लेने से

ज़ख्मी हो जाएगा

तुम्हारा पैर

और

लँगडा कर चलने पर मजबूर हो जाओगे तुम

उसी महफ़िल में

जहाँ

औरत को पैर की जूती कहने की शेखी बघार रहे हो तुम?

35 comments:

Udan Tashtari said...

क्या बात है!!

सुरेन्द्र Verma said...

MInu Ji,
Aapki Bhavnaon ko samjha ja sakta hai par main yah kahna chahunga kee nariyon ko abhi aur bhi prashikshit hone hai taki purush varg unhe "pairon kee JUTI" kah na sake.

संगीता पुरी said...

वाह !! क्‍या खूब लिखा !!

mehek said...

bahut khub

Mithilesh dubey said...

अच्छा लिखा है आपने मिनू जी, लेकिन हर कोई ऐसा नही होता , औरत तो माँ स्वरुप होती हैं।

creativekona said...

मीनू जी ,
व्यंग्य दो तरह के होते है.पहला वह जो सिर्फ ऊपर से
हंसा या गुदगुदा देता है .दूसरा जो दिल के अन्दर तक घाव करने के साथ बहुत कुछ कह जाता है .
आपकी कविताओ को मै बाद वाली श्रेणी में रखता हू.......यानि की गंभीर घाव करने वाला ...
हेमंत कुमार

विपिन बिहारी गोयल said...

खूब कहा

Dr. Mahesh Sinha said...

पता नहीं क्या कहूं
ये कहीं आपके व्यक्तित्वा और कथानक से मिलता नहीं

AlbelaKhatri.com said...

वाह !
क्या ख़ूब तेवर !
क्या ख़ूब कविता !
__________अभिनन्दन !

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

bahut dhaardaar likha hai |

vijay gaur/विजय गौड़ said...

तेवर बरकरार रहने चाहिए।

Atmaram Sharma said...

अच्छा है.

ओम आर्य said...

बहुत कुछ कह गये चन्द पंक्तियो मे........

ओम आर्य said...

बहुत कुछ कह गये चन्द पंक्तियो मे........

Science Bloggers Association said...

Kam shabdon men badee baat.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सुन्दर रचना....बहुत बहुत बधाई....

अनिल कान्त : said...

वाह क्या बात कही है...बेहतरीन

SACCHAI said...

vaah ...aurat ko kabhi kum samjana hi nahi chahiye ...sahi kaha aaapne

----- eksacchai {AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

विनय ‘नज़र’ said...

सच बहुत कड़वा होता है, सार्थक रचना है!
---
तख़लीक़-ए-नज़र

अर्शिया said...

Gahre bhavon ko bahut saralta se bayaan kiya hai aapne.
( Treasurer-S. T. )

vallabh said...

bilkul sahi nishaane par hai ye "Jooti"

JHAROKHA said...

Vah meenu ji....apkee kavitaon ka javab nahee....
Poonam

R S said...

sach kahun to bahut dinoan ke baad hindi padh raha hoon...
aapne ek sach ko bakhoobi pesh kiya..
par shayad aaj jamana badal raha hai..
aurat aaj vaastav mein wo sab paa rahi hain jo wo deserve karti hain..

maaf kijiye...deserve ke liye hindi shabd nahi soch paya..

R S said...

vaise maine aapko apne blog-list main aapke blog ko daal diya hai

Shilpa said...

wow! is the word for it.

संजय बेंगाणी said...

पता नहीं आप सहमत है या नहीं मगर मुझे आपत्ति है. इस कविता से महिलाओं को जूती तुल्य कर दिया, जो काट भी सकती है.

भावनाएं सही है, संदेश सही... मगर जूती कैसे नुकसान पहूँचा सकती है यह बताती है, अतः औरत को जूती मत समझो. और अगर जूती नुकसान न पहूँचाए तो? क्या तब भी समझो?

औरत हो या मर्द, दोनो में न कोई महान है न पतित. समकक्ष है. कोई अपने को महान समझे यह उसकी मूर्खता है, हीन समझे वह उसकी हीन भावना है.

दिगम्बर नासवा said...

vaah कितनी लाजवाब बात likhi है आपने ........... सत्य, सार्थक, sateek ............ पर मैं नहीं maanta aurat pair की jooti है ........ वो sir का taaj है

RAJESHWAR VASHISTHA said...

अच्छी-सी कविता के लिए बधाई..किसी कविता को और भी बेहतर बनाया जा सकता है..माँज-माँज कर...बात तो वही रहती है, पर फिर वह जूती की तरह नहीं काटती..तलवार की तरह काटती है....वैसे आपने जो कहा है...भारत के बहुसंख्यक वर्ग के लिए सही है....हो सकता है...मेरे या आपके घर में ऎसा न भी होता हो...

सुशीला पुरी said...

गजब !!!!!!!!!!! नंगे पांव चलने लगेंगे......हाथ में लटकाकर जूती.

मीनू खरे said...

आप सभी गुणीजनों का धन्यवाद जिन्होने मेरी रचना पढने के लिए समय निकाला.मिथिलेश जी, दिगम्बर जी धन्यवाद आपने औरत को सिर का ताज कहा और उसके माँ स्वरूप को चित्रित किया पर सँजय बेगाणी जी नाराज़गी भी अच्छी लगी.

"औरत हो या मर्द, दोनो में न कोई महान है न पतित. समकक्ष है. कोई अपने को महान समझे यह उसकी मूर्खता है, हीन समझे वह उसकी हीन भावना है."


सँजय जी अगर ध्यान से देखैं तो "जूती" कविता एक व्यंग्य है ऐसे लोगों पर जो औरत को पैर की जूती कहने की शेखी बघारते हैं. कविता में औरत की तुलना जूती से कदापि नही की गई है. बहुत अच्छा लगा औरत की मर्यादा के प्रति आपका ऐसा भाव देखकर.

यह सच है कि हर परिवार में ऐसे लोग नही हैं जो औरत की अवमानना करने के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं पर मित्रों बहुत ऊँचे और पढे लिखे तबकों में भी कुछ लोग ऐसी भावना रखते हैं और यह कविता उन्ही पर कटाक्ष की एक कोशिश थी.

स्थितियाँ बदल रहीं हैं और आशा है आनेवाली दुनिया में औरत सिर का ताज ही बन कर रहेगी.

आमीन.

आभार सहित,
मीनू खरे

Harkirat Haqeer said...

और

लँगडा कर चलने पर मजबूर हो जाओगे तुम

उसी महफ़िल में

जहाँ

औरत को पैर की जूती कहने की शेखी बघार रहे हो तुम?

Bahut khoob ...Minu ji kafi krari chot di hai aapne .....!!

हैरान परेशान said...

वाह भई वाह! खुशी हुई कि भारतीय नारी के स्वर तो बदले. अबतक तो यही रोना था कि वे मेरे प्राण हैं और वे अक्सर प्राण हर लिया करते थे.

Arvind Mishra said...

बढियां है !

APNA GHAR said...

AURAT TO MAA KAA BHI ROOP HOTA HEY . AAUR MAA KEE MAHANTA TO KEHNA HI KYA? AAPKE VICHAR MERI SAMAJH NAHI AYEE. ASHOK.KHATRI 56 @GMAIL.COM

kshama said...

Kitna sahee kaha...kyon koyi waar/takleef bardasht kare?

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