Tuesday, July 28, 2009

कामकाजी महिला

कामकाजी महिला,

अपेक्षा और उलाहने के

दो सिरों के बीच

निरंतर पेंग भरता एक झूला...



जिसको दोनो सिरों पर

ठोकर मिलती है,

झूले की रफ्तार

कुछ और बढाने के लिए .

7 comments:

Science Bloggers Association said...

समाज के नग्‍न यथार्थ को बयां करती है ये रचना।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

dr. ashok priyaranjan said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने । भाव, विचार, शब्द चयन और प्रस्तुतिकरण के सुंदर समन्वय से रचना प्रभावशाली बन पड़ी है ।

मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-इन देशभक्त महिलाओं के जज्बे को सलाम- समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

‘नज़र’ said...

अत्यंत गहरे भाव मन छू लेते हैं

Pakhi said...

Ap to sundar likhti hain.

पाखी के ब्लॉग पर इस बार देखें महाकालेश्वर, उज्जैन में पाखी !!

Neha said...

bahut hi behtarin likha hai aapne.....aage bhi padhna accha lagega...likhti rahen..

Mahesh Sinha said...

आप संक्षिप्त में बहुत कुछ कह जाती हैं

alka sarwat said...

आपने तो मेरी व्यथा लिख दी

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