Monday, July 20, 2009

माँ का ख़त

माँ का ख़त

कल रात

इक ख़त को खोलते ही

बत्ती चली गयी ...


माँ वो ख़त

तुम्हारा ही है न ?


अँधेरे में मैंने

अक्षरों को सहला कर देखा था

बड़े मुलायम थे हर्फ़ .

12 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Bahut Bahut BADHAAYI.

Arvind Mishra said...

स्नेहिल अनुभूति के पल ....

vandita said...

बेहद संवेदनशील!

Saiyed Faiz Hasnain said...

Ek Pyaar Bhara Ahesaas

creativekona said...

अक्षरों को सहला कर देखा था
बड़े मुलायम थे हर्फ़ .
मीनू जी ,
माँ के लिए इतनी बढ़िया कविता ..इतनी कोमल अनुभूतियों के साथ ...बहुत अच्छी लगी कविता .बधाई .
हेमंत कुमार

Devburman said...

Letter from Mother.. is an incomplete poem. It starts like a Kabuki but finished like a Haiku keeping the readers in much wanting situation. The beginning was just the AALAP, but unfortunately there was no ANTRA. Please complete it. The starting was haunting and possess tremolo effect.

श्यामल सुमन said...

कमाल का लिखतीं हैं आप। कम शब्दों में बात कहने का बेहतर अंदाज। तारीफ करता हूँ आपकी शैली का।

नोट- टिप्पणीकर्ताओं की सुविधा के लिए वर्ड वेरीफिकेशन को हँटाने का उपाय करें।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

neelam said...

wallllllllllllllah .

poemsnpuja said...

badi apni si lagi ye kavita, sach me mummy ki chitthiyan aisi hi hoti hain.

अजय कुमार said...

मां का स्पर्श ,वाकई निराला होता है

prerna argal said...

maa ka har sparse snehseel hota hai.maa hoti hi aesi hai.badhaai itani achchi bhavmai rachanaa.ke liye.




please visit my blog.thanks.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत संवेदनशील रचना

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