Tuesday, August 24, 2010

दीप बिना राखी का त्यौहार


बहुत याद आ रहा है उसका चेहरा. बड़े होकर भी कहाँ बदल पाया वो? ना ही चेहरा, न ही उसका बात करने का तरीका. पिछली बार जब उसके हाथ पर राखी बाँधी थी तो वो डायनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठा था. सर पर रुमाल रख कर जब मैंने टीका लगाया था तो उसका झुक कर पैर छूना आज भी याद है. सगा भाई तो भगवान ने नहीं दिया पर बचपन से सबसे पहले उसी को राखी बांधी अतः भाई होने का अहसास कैसा होता है यह सबसे पहले उसी ने बताया. वैसे भी चाचा का बेटा सगे भाई से कहाँ अलग होता है. बचपन से लेकर उसके साथ बीते पल आज याद आ रहे हैं. १९९५ में किडनी ट्रांसप्लांट होने के लिए हस्पताल जाता मेरा भाई, अपनी बीमारी से पिछले १५ सालों से लगातार जूझता मेरा भाई... आखिर हार गया. रक्षा बंधन से ठीक २७ दिन पहले २७ जुलाई को.... बीमारी की हालत में भी वो कहता था की इस बार सारी बहनों से राखी बंधवाने ज़रूर जाऊंगा. पर ईश्वर को यह मंज़ूर नही था. "दीप" था मेरे भाई का नाम जो मुझसे १५-१६ साल छोटा था. आज दीप नहीं है.. दीप के बिना मन अन्धेरा होना तो स्वाभाविक ही है. आज हर भाई के हाथ पर राखी देख मन बहुत कचोट रहा है. प्यारा भाई याद आ रहा है. दीप नहीं है पर हम सबके लिए अपने बेटे शिखर को छोड़ गया. आज इस सूने रक्षाबन्धन पर शिखर के लिए यही कामना करती हूँ कि उसके जीवन में कभी कोई अन्धेरा न आए .

6 comments:

Arvind Mishra said...

ओह आपकी पीड़ा समझ सकता हूँ !

सुशीला पुरी said...

ओह ! आपने मुझे रुला दिया ,मेरा भी एक सगा छोटा भाई हमे दगा देकर चला गया और आज उसे याद करते हुये मन भारी है ।

मनोज कुमार said...

एक भावपूरित रचना।

Mithilesh dubey said...

रक्षाबंधन की बधाई ।

दिगम्बर नासवा said...

आपकी पीड़ा समझ आती है मीनू जी ... पर आज उनको याद कर के आपने बहन का फर्ज़ ज़रूर पूरा किया है ....
आशाओं को जीवन में जीवित रखना बहुत आवश्यक है .... अच्छी पोस्ट है आपकी ...

RJ Rajeev said...

mam ! mai tho ro bhi nhi sakta! ek rista jo uper wale ne mere liye banaya hi nhi..........

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