(कार्तिक-पूर्णिमा पर )
वो जो नदी है
उसमे रहती हैं ढेर सारी मछलियां
जिन्हें बचपन में
आटे की गोलियाँ खिलाई थी मैंने
अपने बाबा के साथ
घाट की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े होकर .
वो जो नदी है
बसती हैं उसमे ढेर सारी डुबकियाँ
नाक बंद करके लगाई थी जो मैंने
गहरे पानी में
अपनी दादी का हाथ पकड़कर.
उसी नदी में बसती है
तैरने से पहले
छपाक से कूदने की न जाने कितनी आवाजें
नावों की हलचलें
कमर तक डूब कर सूर्य को दिए गए अर्घ्य
पियरी चढ़ाने की मन्नतें
तुलसी पूजा के बिम्ब
हर हर महादेव की गूँज
हरे पत्ते के दोनों में
पानी पर तिरते दीपक
और ढेर सारा पॉलिथीन.
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Saturday, November 20, 2010
Tuesday, August 24, 2010
दीप बिना राखी का त्यौहार
बहुत याद आ रहा है उसका चेहरा. बड़े होकर भी कहाँ बदल पाया वो? ना ही चेहरा, न ही उसका बात करने का तरीका. पिछली बार जब उसके हाथ पर राखी बाँधी थी तो वो डायनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठा था. सर पर रुमाल रख कर जब मैंने टीका लगाया था तो उसका झुक कर पैर छूना आज भी याद है. सगा भाई तो भगवान ने नहीं दिया पर बचपन से सबसे पहले उसी को राखी बांधी अतः भाई होने का अहसास कैसा होता है यह सबसे पहले उसी ने बताया. वैसे भी चाचा का बेटा सगे भाई से कहाँ अलग होता है. बचपन से लेकर उसके साथ बीते पल आज याद आ रहे हैं. १९९५ में किडनी ट्रांसप्लांट होने के लिए हस्पताल जाता मेरा भाई, अपनी बीमारी से पिछले १५ सालों से लगातार जूझता मेरा भाई... आखिर हार गया. रक्षा बंधन से ठीक २७ दिन पहले २७ जुलाई को.... बीमारी की हालत में भी वो कहता था की इस बार सारी बहनों से राखी बंधवाने ज़रूर जाऊंगा. पर ईश्वर को यह मंज़ूर नही था. "दीप" था मेरे भाई का नाम जो मुझसे १५-१६ साल छोटा था. आज दीप नहीं है.. दीप के बिना मन अन्धेरा होना तो स्वाभाविक ही है. आज हर भाई के हाथ पर राखी देख मन बहुत कचोट रहा है. प्यारा भाई याद आ रहा है. दीप नहीं है पर हम सबके लिए अपने बेटे शिखर को छोड़ गया. आज इस सूने रक्षाबन्धन पर शिखर के लिए यही कामना करती हूँ कि उसके जीवन में कभी कोई अन्धेरा न आए .
Monday, March 08, 2010
मेरा घर
(अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष)
बचपन से सुना था
माँ के मुँह से
कि
यह घर मेरा नहीं है
जब मैं बड़ी हो जाऊँगी
तो मुझे
शादी होकर जाना है
अपने घर.
शादी के बाद
ससुराल में सुना करती हूँ
जब तब...
अपने घर से क्या लेकर आई है
जो यहाँ राज करेगी?
यह तेरा घर नही है,
जो अपनी चलाना चाहती है...
यहाँ वही होगा जो हम चाहेंगे,
यह हमारा घर है, हमारा !
कुछ समझी?
बचपन से सुना था
माँ के मुँह से
कि
यह घर मेरा नहीं है
जब मैं बड़ी हो जाऊँगी
तो मुझे
शादी होकर जाना है
अपने घर.
शादी के बाद
ससुराल में सुना करती हूँ
जब तब...
अपने घर से क्या लेकर आई है
जो यहाँ राज करेगी?
यह तेरा घर नही है,
जो अपनी चलाना चाहती है...
यहाँ वही होगा जो हम चाहेंगे,
यह हमारा घर है, हमारा !
कुछ समझी?
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