(कार्तिक-पूर्णिमा पर )
वो जो नदी है
उसमे रहती हैं ढेर सारी मछलियां
जिन्हें बचपन में
आटे की गोलियाँ खिलाई थी मैंने
अपने बाबा के साथ
घाट की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े होकर .
वो जो नदी है
बसती हैं उसमे ढेर सारी डुबकियाँ
नाक बंद करके लगाई थी जो मैंने
गहरे पानी में
अपनी दादी का हाथ पकड़कर.
उसी नदी में बसती है
तैरने से पहले
छपाक से कूदने की न जाने कितनी आवाजें
नावों की हलचलें
कमर तक डूब कर सूर्य को दिए गए अर्घ्य
पियरी चढ़ाने की मन्नतें
तुलसी पूजा के बिम्ब
हर हर महादेव की गूँज
हरे पत्ते के दोनों में
पानी पर तिरते दीपक
और ढेर सारा पॉलिथीन.
