(कार्तिक-पूर्णिमा पर )
वो जो नदी है
उसमे रहती हैं ढेर सारी मछलियां
जिन्हें बचपन में
आटे की गोलियाँ खिलाई थी मैंने
अपने बाबा के साथ
घाट की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े होकर .
वो जो नदी है
बसती हैं उसमे ढेर सारी डुबकियाँ
नाक बंद करके लगाई थी जो मैंने
गहरे पानी में
अपनी दादी का हाथ पकड़कर.
उसी नदी में बसती है
तैरने से पहले
छपाक से कूदने की न जाने कितनी आवाजें
नावों की हलचलें
कमर तक डूब कर सूर्य को दिए गए अर्घ्य
पियरी चढ़ाने की मन्नतें
तुलसी पूजा के बिम्ब
हर हर महादेव की गूँज
हरे पत्ते के दोनों में
पानी पर तिरते दीपक
और ढेर सारा पॉलिथीन.
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Saturday, November 20, 2010
Thursday, August 20, 2009
एक कविता सिर्फ़ तुम्हारे लिए
उस दिन
जबसे बारिश नहीं हुआ करेगी, न होंगे बादल, न आसमान,
उस दिन
जबसे हवाएँ नहीं बहा करेंगी ,वृक्ष नहीं होंगे, न ही उनकी टहनियाँ, न पत्तियाँ, न कोपलें.
जब समुद्र तट पर नहीं देखी जा सकेंगी चौपाटियाँ,
आना बंद कर देंगे वहाँ हमेशा के लिए
भेलपुरी/पानीपूरी वाले.
कभी नहीं दिखेंगी वहाँ जब
पल में रचने वाली, मेहँदी लगानेवालियाँ.
बेले के गजरे जब मुरझा जाएँगे सदा के लिए
और
मोगरे की लड़ियाँ बिकनी बंद हो जाएंगी जबसे
हमेशा के लिए.
जब समुद्र की लहरें नहीं होंगी,
गीली रेत पर पैरों के निशाँ नहीं होंगे,
और लहरों में भीगने से बचने के लिए,
जींस/शलवार को घुटनों तक चढा लेने की हिदायतें भी न होंगी जब!
जब सूरज न होगा, ना ही उसकी रश्मियाँ, ना ही धूप ही बची रह जाएगी
तारे नहीं होंगे
जिस दिन साँसे भी अस्तित्व में नहीं रह जाएंगी
और चाँद भी कहाँ होगा भला तब?
नदी, झील, झरने, सब थम जाएंगे
धरती, जल, मिट्टी
कुछ भी न बचे होंगे जब
उस दिन भी
शेष रह जाएगी
रुई के नर्म रेशों सी
ब्रह्माण्ड में तिरती
तुम्हे पा लेने की मेरी अपरिमित इच्छा.
जबसे बारिश नहीं हुआ करेगी, न होंगे बादल, न आसमान,
उस दिन
जबसे हवाएँ नहीं बहा करेंगी ,वृक्ष नहीं होंगे, न ही उनकी टहनियाँ, न पत्तियाँ, न कोपलें.
जब समुद्र तट पर नहीं देखी जा सकेंगी चौपाटियाँ,
आना बंद कर देंगे वहाँ हमेशा के लिए
भेलपुरी/पानीपूरी वाले.
कभी नहीं दिखेंगी वहाँ जब
पल में रचने वाली, मेहँदी लगानेवालियाँ.
बेले के गजरे जब मुरझा जाएँगे सदा के लिए
और
मोगरे की लड़ियाँ बिकनी बंद हो जाएंगी जबसे
हमेशा के लिए.
जब समुद्र की लहरें नहीं होंगी,
गीली रेत पर पैरों के निशाँ नहीं होंगे,
और लहरों में भीगने से बचने के लिए,
जींस/शलवार को घुटनों तक चढा लेने की हिदायतें भी न होंगी जब!
जब सूरज न होगा, ना ही उसकी रश्मियाँ, ना ही धूप ही बची रह जाएगी
तारे नहीं होंगे
जिस दिन साँसे भी अस्तित्व में नहीं रह जाएंगी
और चाँद भी कहाँ होगा भला तब?
नदी, झील, झरने, सब थम जाएंगे
धरती, जल, मिट्टी
कुछ भी न बचे होंगे जब
उस दिन भी
शेष रह जाएगी
रुई के नर्म रेशों सी
ब्रह्माण्ड में तिरती
तुम्हे पा लेने की मेरी अपरिमित इच्छा.
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