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Thursday, August 20, 2009

एक कविता सिर्फ़ तुम्हारे लिए

उस दिन
जबसे बारिश नहीं हुआ करेगी, न होंगे बादल, न आसमान,

उस दिन
जबसे हवाएँ नहीं बहा करेंगी ,वृक्ष नहीं होंगे, न ही उनकी टहनियाँ, न पत्तियाँ, न कोपलें.


जब समुद्र तट पर नहीं देखी जा सकेंगी चौपाटियाँ,
आना बंद कर देंगे वहाँ हमेशा के लिए
भेलपुरी/पानीपूरी वाले.
कभी नहीं दिखेंगी वहाँ जब
पल में रचने वाली, मेहँदी लगानेवालियाँ.



बेले के गजरे जब मुरझा जाएँगे सदा के लिए
और
मोगरे की लड़ियाँ बिकनी बंद हो जाएंगी जबसे
हमेशा के लिए.



जब समुद्र की लहरें नहीं होंगी,
गीली रेत पर पैरों के निशाँ नहीं होंगे,
और लहरों में भीगने से बचने के लिए,
जींस/शलवार को घुटनों तक चढा लेने की हिदायतें भी न होंगी जब!



जब सूरज न होगा, ना ही उसकी रश्मियाँ, ना ही धूप ही बची रह जाएगी


तारे नहीं होंगे


जिस दिन साँसे भी अस्तित्व में नहीं रह जाएंगी


और चाँद भी कहाँ होगा भला तब?
नदी, झील, झरने, सब थम जाएंगे


धरती, जल, मिट्टी
कुछ भी न बचे होंगे जब


उस दिन भी
शेष रह जाएगी
रुई के नर्म रेशों सी
ब्रह्माण्ड में तिरती

तुम्हे पा लेने की मेरी अपरिमित इच्छा.

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