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Monday, September 12, 2011

चलो लिख डालें एक कविता





बहुत दिनों बाद मन है –

चलो लिख डालें एक कविता.

चलो लिख कर देखें

ढेर सारे सपने

सजाता है जिन्हें रोज मन

नींद आने के बस तुरंत बाद..

चलो पिरो दे पंक्तियों में

उन सारी पीडाओं को

व्यथाओं को

जो मन पर बोझ बन कर रहती हैं

और आत्मा जिन्हें न चाहते हुए भी सहती है...

चलो शब्द दे दें

भगवान से अपनी शिकायतों को...

चलो कह दें जग से

वो शिकवे

जो हैं हमें हँथेली की रेखाओं से...

चलो रचें वो सारे वाक्य

सुनना चाहते है जिन्हें कान

देखना चाहती है जिन्हें आँखे

अपने आगे सच होते हुए...

चलो उठाओ कलम और लिख डालो

या

रखो उँगलियाँ की-बोर्ड पर

और

छाप डालो वो सब कुछ

जो असल जिन्दगी में न सही

मगर कविता में तो जरूर हो सकता है सच.

Sunday, January 10, 2010

बुढ़ापे का सन्नाटा कैम्पस



बुढ़ापे के सन्नाटे कैम्पस में

प्रतिदिन सिकुड़ते
माँ-बाप का वज़न
इतना कैसे हो जाता है

कि बोझ लगने लगते हैं वे...


वो--

जिसके पास हो
डायटिंग की ऐसी तकनीक
जो कम कर सके
बोझ लगने वाला यह एकस्ट्रा फ़ैट

मुझे तलाश है

एक ऐसे डॉक्टर की.

Monday, December 21, 2009

इन्सिग्नीफिकेंट




दोस्ती
इन्सिग्नीफिकेंट

दोस्त
इन्सिग्नीफिकेंट

मौक़े
सिग्नीफिकेंट

परिणाम
सिग्नीफिकेंट.

Tuesday, September 15, 2009

सिफ़र का सफ़र




आज आपके लिए ले कर आई हूँ एक गीत. वास्तव में यह गीत, आजकल प्रत्येक शुक्रवार शाम 6:15 बजे, आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित हो रहे रेडियो धारावाहिक, "सिफ़र का सफ़र" का शीर्षक गीत है. यह नाट्य-धारावाहिक उन महिलाओं के जीवन की सच्ची घटनाओं पर आधारित है जिन्होने शून्य से शुरुआत कर शिखर तक पहुँचने में सफलता प्राप्त की और महिला सशक्तीकरण की अनुकरणीय मिसाल प्रस्तुत की. इस धारावाहिक को बनाने का अनुभव बहुत रोमांचकारी रहा. दुर्गम गाँवों की ऐसी-ऐसी महिलाओं से मिलने और उन्हें जानने का मौक़ा इसको बनाने के बहाने मिला, जो भले ही पढी-लिखी नही पर निसंकोच स्वीकारती हूँ कि उनकी हिम्मत और मेहनत की कहानी सुन कर कई बार मैंने अपने आपको छोटा मह्सूस किया. आपको उन महिलाओं से मिलवाऊँगी, आगे इसी ब्लॉग पर. आज प्रस्तुत है "सिफ़र का सफ़र" का शीर्षक-गीत. आपकी सुविधा के लिए गीत के साथ इसका ऑडियो भी प्रस्तुत है. इसका संगीत तैयार किया है हेम सिंह ने और गायन स्वर संगीता मिश्रा का है. पढिए, सुनिए यह गीत. कोशिश की है कि गीत के माध्यम से इन महिलाओं का जीवन अभिव्यक्त कर सकूँ. गीत आपको कैसा लगा, यह जानने का इंतज़ार रहेगा.


सिफ़र के सफ़र में, अँधेरों की स्याही
कहानी ये किसने लिखी और सुनाई ?

मगर हमने सपना अलग इक सजाया
किरनों को जोड़ा और सूरज उगाया,

सतरंगी चूनरिया पंख बने अरमान
हौसलों की हमने भरी एक उड़ान,

बूँद-बूँद रौशनी से जगमग जहान
आँगन में दुनिया आँचल में आसमान.


(गीत सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Tuesday, August 18, 2009

सावन

जब जब भी

बेतरह बरसती हैं

मेरी आँखें ,

बेहद हैरानी होती है

कि

मन के किसी कोने में

अब भी सावन बसता है.


और

जब जब भी

बेतरह बरसती हैं

मेरी आँखें ,

बेहद खुशी भी होती है

कि

मन के किसी कोने में

अब भी सावन बसता है .

Tuesday, August 04, 2009

एग्रीमेंट

तुमने,

नींद में

एक एग्रीमेंट सामने रखा...



और मै,

साइन कर बैठी

हक़ीक़त में

बिना कोई क्लॉज़ पढे .

Sunday, August 02, 2009

घरेलू महिला


घरेलू महिला,

कुछ उल्टे, कुछ सीधे

फंदों के बीच

फँसी एक सलाई ...



जिसके बिना

स्वेटर की उत्पत्ति संभव नहीं,

पर फिर भी

जिसका कोई अधिकार नहीं

स्वेटर के रंग, आकार और डिजाईन पर .

Tuesday, July 28, 2009

कामकाजी महिला

कामकाजी महिला,

अपेक्षा और उलाहने के

दो सिरों के बीच

निरंतर पेंग भरता एक झूला...



जिसको दोनो सिरों पर

ठोकर मिलती है,

झूले की रफ्तार

कुछ और बढाने के लिए .

Sunday, July 26, 2009

उदासी

उदासी,

मेरी आँखों के ड्राइंग रूम में

बड़े इत्मिनान से बैठी थी

पलकों के सोफा सेट पर,



तुम्हारा फोन आया

और उदासी

शर्म से ज़मीन में गड़ गयी.

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