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Tuesday, November 13, 2012

दीपावली पर कुछ कविताएँ




(1)          प्लास्टिक का तोरण
         दरवाजे पर लगा देख
                बहुत याद आया
                    आम का पेड़
                      जो हाल में कटा था.

(2)          खिलौने बेचने वाले बच्चों ने ,
                     खिलौने खेलने वाले बच्चों से कहा,
                                                        हैप्पी दीवाली.






(3)              जग रंगा है रौशनी से,
                                 दीवाली है,
                                       रौशनी की होली.






(4)       प्लास्टिक के फूल,
                   प्लास्टिक के बन्दनवार,
                           प्लास्टिक का स्वास्तिक,
                                    प्लास्टिक के लक्ष्मी-पाँव,
                                                 प्लास्टिक का मन,
                                                       प्लास्टिक से सम्बन्ध.






(5)   रात में माँ लक्ष्मी दबे पाँव आईं,
               और बही-खातों में दबे सभी घोटाले कैंसिल कर दिए,
                              अगले दिन देश के सब स्लम एरिया और 

                                            झोपडपट्टी अचानक गायब हो गए. 



(6)    ईश्वर आएँ 
               दलिद्दर भागे,
                       हो शुभ दीवाली.




आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ.  

बहुत दिन बाद ब्लॉग पर आई हूँ आशा करती हूँ कि पुराने साथी मुझे भूले नही होंगे.

Sunday, February 28, 2010

देख बहारें होली की






जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की

परियों के रंग दमकते हों
खूँ शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे में छकते हों
तब देख बहारें होली की

नाच रंगीली परियों का
कुछ भीगी तानें होली की
कुछ तबले खड़कें रंग भरे
कुछ घुँघरू ताल छनकते हों
तब देख बहारें होली की

मुँह लाल गुलाबी आँखें हों
और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को
अंगिया पर तककर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों
तब देख बहारें होली की

जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की

- नज़ीर अकबराबादी








बहुत दिन बाद कोयल
पास आकर बोली है
पवन ने आके धीरे से
कली की गाँठ खोली है.

लगी है कैरियां आमों में
महुओं ने लिए कूचे,
गुलाबों ने कहा हँस के
हवा से अब तो होली है.

-त्रिलोचन





गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में
बुझे दिल की लगी भी तो ए यार होली में.

नहीं यह है गुलाले सुर्ख़ उड़ता हर जगह प्यारे,
ये आशिक ही है उमड़ी आहें आतिशबार होली में.

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझको भी जमाने दो,
मनाने दो मुझे भी जानेमन त्योहार होली में.

है रंगत जाफ़रानी रुख़ अबीरी कुमकुम कुछ है,
बने हो ख़ुद ही होली तुम ए दिलदार होली में.

रसा गर जामे-मय ग़ैरों को देते हो तो मुझको भी,
नशीली आँख दिखाकर करो सरशार होली में.

-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र


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