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Monday, July 20, 2009

माँ का ख़त

माँ का ख़त

कल रात

इक ख़त को खोलते ही

बत्ती चली गयी ...


माँ वो ख़त

तुम्हारा ही है न ?


अँधेरे में मैंने

अक्षरों को सहला कर देखा था

बड़े मुलायम थे हर्फ़ .

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